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लेखक/रचयिता: स्वयं प्रकाश
यह कहानी देशप्रेम की भावना पर आधारित है। हालदार साहब हर पंद्रहवें दिन कस्बे से गुजरते थे, जहाँ चौराहे पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति लगी थी। मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल जी चश्मा बनाना भूल गए थे। कस्बे का देशभक्त कैप्टन चश्मेवाला रोज अपनी दुकान से निकालकर नेताजी को असली चश्मा पहनाता था। कैप्टन की मृत्यु के बाद चौराहे की मूर्ति बिना चश्मे की हो गई, पर अंत में बच्चों द्वारा सरकंडे का बनाया चश्मा देखकर हालदार साहब भावुक हो गए।
देशभक्ति केवल सेना में रहने से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कार्यों में राष्ट्र-सम्मान से प्रकट होती है।
संवेदनशील, भावुक और देशभक्त नागरिक।
शारीरिक रूप से लँगड़ा पर महान देशभक्त चश्मा विक्रेता।
हँसोड़, मोटा और देशभक्ति का उपहास उड़ाने वाला व्यावहारिक व्यक्ति।
उत्तर: क्योंकि उसके मन में देश के स्वतंत्रता सेनानियों (विशेषकर नेताजी) के प्रति अगाध श्रद्धा और सम्मान की भावना थी।
उत्तर: कैप्टन की मृत्यु की खबर सुनकर हालदार साहब सोच रहे थे कि अब नेताजी की बिना चश्मे की मूर्ति को चश्मा कौन पहनाएगा।
उत्तर: सरकंडे का चश्मा देखकर उन्हें विश्वास हो गया कि देश की नई पीढ़ी में भी देशभक्ति की भावना जीवित है।