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लेखक/रचयिता: मिथलेश्वर
यह कहानी ग्रामीण जीवन में पारिवारिक आत्मीयता के क्षरण और धर्म-स्थानों (महंतों) के स्वार्थी स्वरूप को उजागर करती है। हरिहर काका के पास 15 बीघे ज़मीन थी। उनके सगे भाई और ठाकुरबारी के महंत दोनों ही उनकी ज़मीन हथियाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग करते हैं। अंत में काका मौन धारण कर लेते हैं।
रिश्तों का बाज़ारीकरण और स्वार्थपरता।
निःसंतान, असहाय और 15 बीघे ज़मीन के मालिक वृद्ध।
धर्म की आड़ में संपत्ति हड़पने वाला धूर्त स्वामी।
काका का शुभचिंतक मित्र।
उत्तर: दोनों ही काका से निस्वार्थ प्रेम नहीं करते थे, बल्कि उनकी 15 बीघे ज़मीन हथियाने के लिए छलावा और हिंसा कर रहे थे।