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लेखक/रचयिता: रामवृक्ष बेनीपुरी
बालगोबिन भगत कबीरपंथी साधु स्वभाव के गृहस्थ थे। वे मँझोले कद के गोरे-चिट्ठे 60 वर्ष के वृद्ध थे। वे कबीर को 'साहब' मानते थे और खेत की हर उपज कबीरमठ में भेंट करके प्रसाद रूप में प्राप्त अन्न से गृहस्थी चलाते थे। जब उनका इकलौता पुत्र मरा, तो उन्होंने रोने के बजाय आत्मा का परमात्मा से मिलन मानकर उत्सव मनाया और बहू से ही बेटे की चिता को अग्नि दिलवाकर विधवा पुनर्विवाह का आदेश दिया।
साधुता बाह्य पहनावे से नहीं, बल्कि पवित्र आचरण और सामाजिक रूढ़ियों के खंडन से सिद्ध होती है।
कबीर के आदर्शों पर चलने वाले निर्भीक साधु-गृहस्थ।
पतिव्रता, सुशील और ससुर की सेवा करने वाली।
उत्तर: वे कभी झूठ नहीं बोलते थे, किसी की चीज़ बिना पूछे प्रयोग नहीं करते थे, और कबीर को अपना साहब मानते थे।
उत्तर: उन्होंने बेटे के शव को सफेद कपड़े से ढककर फूल बिखराए और कबीर के पद गाते हुए कहा कि विरहिणी आत्मा का परमात्मा से मिलन हो गया है।